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2020-04-08 (2)

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* सत्यानुभूति संदेश *

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मानव जीवन का परम् लक्ष्य सत्य को जानना है .उसके पश्चात् उसे जानने के लिए कुछ शेष नहीं बचता . यही मूल जीवन दर्शन है . जिसे सदैव अपनी स्मृति में रखना चाहिए .
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* सहज आध्यात्मिक चिंतन और सामान्य जनमानस *

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मेरी भावना है कि अध्यात्म जैसे महत्वपूर्ण एवं व्यापक विषय को , सहज एवं सरल पद्धति द्वारा जनसामान्य तक पहुँचाकर , अधिक से अधिक विस्तार दिया जाय . कहीं इस दर्शन का गूढ़ एवं रहस्यपूर्ण स्वरूप ही इसके जन सामान्य तक पहुँचने में सदैव बाधा न बना रहे . इसी लक्ष्य को लेकर मैंने इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास प्रारम्भ किया है . मेरी मान्यता है कि यदि अध्यात्म जैसे गूढ़ एवं रहस्यपूर्ण विषय को भी ,जन सामान्य की मानसिक क्षमता ,उन्हीं की भाषा शैली और उन्हीं के व्यवहारिक मनोविज्ञान के अनुरूप व्याख्यित किया जाय , तो स्रोता उसे सहर्ष स्वीकार करने लगेगा. विस्तृत एवं संवेदनशील भाषा कौशल विषय को और भी रुचिकर एवं सहज बना सकता है . इससे अधिक से अधिक जनमानस तक आध्यात्म जैसे विषय के मर्म को पहुँचाने में सुविधा तो होगी ही . साथ ही विषय का एक नवीन कलेवर भी अपने सुगम एवं सामान्य स्वरूप में जन सामान्य तक पहुँचेगा. अध्यात्म की अपनी भी कुछ सीमाएं हैं , जिनका कि उलंघन नहीं किया जा सकता. किन्तु हमें अपने लक्ष्य और विश्वास की सीमाओं के स्वरूप का विस्तार करना ही होगा . और अध्यात्म से ही प्रेरणा लेकर उसे और भी आधुनिक एवं व्यापक बनाना होगा .
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* मानव,जगत और परमात्मा * [ संक्षिप्त विवरण ]

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………. मानव = यह मानवजगत का नायक है. और मनावजगत का नेतृत्व करता है. क्योंकि केवल इसी के पास बुद्धि है . जो उसे परमात्मा ने प्रदान की है . यह मानव के सिवाय और किसी के भी पास नहीं है . यही उसकी विशेष पहचान है .
………. जगत = सृष्टि द्वारा जो कुछ भी रचा गया है . जो दृश्यमान है और इन्द्रियां जिसे अनुभव कर सकती हैं वह सब कुछ जगत है . और मनुष्य भी इसी जगत का हिस्सा है .
………. परमात्मा = परमात्मा अदृश्य है . और इन्द्रियों की पहुँच से परे है . वह दीखता तो नहीं है , किन्तु अदृश्य होकर भी सब कुछ जानता है. क्योंकि सब कुछ उसी के संकल्प द्वारा घटित होता है . जगत के सम्पूर्ण ऐश्वर्य का दाता वही है . इसी लिए उसे ईश्वर कहा गया है . वह सभी जीवों में समाहित होने से सबका आत्मा है . इसीलिये उसे परम् आत्मा , अर्थात परमात्मा कहा गया है.
………. [ विशष ] = मैंने यहाँ बड़े ही सहज भाव से , अत्यंत सरल शैली में अपनी बात को प्रारम्भ किया है . जिससे कि सामान्य से सामान्य श्रोता भी मेरे साथ-साथ सरलता से आगे बढ़ता चले और किसी प्रकार की कोई असुविधा अनुभव न कर पाए . मेरा मानना है कि जीवन में धैर्य ही परम्-धर्म है . क्योंकि धैर्य के साथ चलते जांय तो एक दिन ऊंचे एवरेस्ट तक भी पहुँच जाते हैं . प्रारम्भ में विषय को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है . जो धीरे-धीरे विकसित होता जाएगा और एक दिन अपने व्यापक स्वरूप को भी प्राप्त कर लेगा . मैंने यहाँ मानव , जगत और परमात्मा का संक्षिप्त परिचय दिया है . क्योंकि अभी इतना ही बताना आवश्यक था . आगे चलकर ये विषय व्यापक होते चले जायेंगे. ]
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* परमात्मा, प्रकृति, जगत और मानव *

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मैंने अब तक इन चारों विषयों पर थोड़ा – थोड़ा प्रकाश डाला है . ये ही वे प्रधान विषय है , जिनपर अधिक चिंतन होना है . हम स्पष्ट करेंगे कि इन चारों में परस्पर क्या सम्बन्ध है .
………. परमात्मा = परमात्मा जगतनियंता है . जगत में जो कुछ भी घटता है , उसका नियोजन ,उसके संकल्प के द्वारा ही होता है . क्योंकि वही सर्वोच्च सत्ता है . सभी उसके समक्ष नतमस्तक है . एक वही जगत आधार है . जगत का कण-कण उसी के द्वारा प्रदान किये गए आधार पर स्तिथ होने के कारण अस्तित्वमय है.यदि वह अपना आधार खींच ले तो सभी कुछ अस्तित्वहीन हो जायगा.
………. प्रकृति = यदि परमात्मा जगत नियंता है . तो प्रकृति जगतस्वरूपा है . जब तक परमात्मा के संकल्प को प्रकृति स्वरूप प्रदान नहीं करती, तब तक वह बस संकल्प मात्र है . इसीलिये परमात्मा के सर्वशक्तिमान होते हुए भी प्रकृति उनका अति महत्त्वपूर्ण अंग है. जगत की सृष्टि हेतु दोनों एक दूसरे के पूरक हैं .
किन्तु अंततः प्रकृति परमात्मा की सहयोगी मात्र ही है . जगत की सर्वोच्च सत्ता तो परमात्मा ही है .
………. जगत = सृष्टि के समय परमात्मा के संकल्प अनुसार ही जगत की रचना होती है . जिसमें सम्पूर्ण नियोजन परमात्मा का होता है. और उसका कार्यान्वन प्रकृति का . अपने अद्भुत संकल्प से जगत को अनंत ऐश्वर्य व अनुपम स्वरूप प्रदान कर परमात्मा ने अपनी क्षमता को दर्शा दिया . युगों तक खोजते रहने के उपरांत भी उसके द्वारा रचे हुए जगत की थाह पाना पूर्णतःअसंभव है. परमात्मा द्वारा प्रदान इस असीमित ऐश्वर्य के कारण ही जगत ने उसे ईश्वर जैसे सार्थक नाम से विभूषित किया है .
………. मानव = सृष्टि के समय जगत को वैभव पूर्ण स्वरुप प्रदान करने के पश्चात् यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि इस वैभवशाली जगत का संचालन कैसे होगा . यहाँ सुचारू व्यवस्था किस प्रकार स्थापित हो पायेगी. जगत कल्याण हेतु जगत का नेतृत्व कौन करेगा. इसके समाधान हेतु परमात्मा ने अपने संकल्प से एक बुद्धि युक्त जीव मानव को उत्पन्न किया . जो अपने विवेक से जगत का नेतृत्व कर सके . आज की एक मात्र बुद्धि युक्त मानव जाति उसी संकल्प का परिणाम है . जो परमात्मा के संकल्प अनुसार कार्यरत है .
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* परमात्मा *

परम् तत्त्व, परम् सत्य ,परम् ईश्वर ,परम् ब्रह्म, परम् आधार, परम् आनंद, परम् चैतन्य आदि परमात्मा के अनंत संबोधन है . उस परम्-तत्त्व को जिसने जैसा अनुभव किया , उसने उसे वैसे ही नाम से पुकारा. परमात्मा एक व्यापक विषय है . न जान पायें तो अत्यंत कठिन है और जान पायें तो बहुत ही सरल भी . परमात्मा, जगत और मानव , इनका प्रारम्भ में विषय की भूमिका के रूप में एक सरल एवं संक्षिप्त परिचय दिया गया है . ये तीनों ही विषय के महत्वपूर्ण अंग हैं .
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* महानायक व अद्भुत शिल्पी *

मानव तो केवल मानवजगत का ही नायक है . किन्तु सम्पूर्ण जगत का महानायक तो परमात्मा है . वही जगत की सरवोच्च सत्ता है . क्योंकि उससे ऊपर दूसरा कोई है ही नहीं . जगत में सब कुछ उसी के अद्भुत संकल्प और उसी की अलौकिक परिकल्पना का परिणाम है . वह अद्भुत शिल्पकार है . जगत का रूप , स्वरुप और अथाह ऐश्वर्य , जोकि मानव मस्तिष्क की कल्पना से सर्वदा परे है , उसी ने जगत को प्रदान किया है , जिसके एक अंश मात्र को भी मापना मानव मस्तिष्क के लिए संभव नहीं है . इतना सामर्थ्यवान केवल वही हो सकता है . क्योंकि वह परम्-तत्त्व है . जिसे कोई चुनौती नहीं दी जा सकती…… उस महानायक की उपलब्धियां तो सबको दिखाई देती हैं . किन्तु वह स्वयं कभी किसी को दिखाई नहीं देता . सभी को सदा उसके दर्शन की अभिलाषा बनी ही रहती है . वह अदृश्य रहकर भी नित्य संकल्परत है और उसके सभी संकल्प प्रकृति के माध्यम से स्वतः संपन्न होते रहते है .
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* सत्य और सत्यानुभूति *

सत्य जगत का मूल तत्त्व है . और उसका साक्षात् अनुभव ही सत्य की अनुभूति है . इस यथार्थ तक पहुँचने में कितने दिन ,कितने माह ,कितने वर्ष ,कितने जन्म या कितने युग लगेंगे , कोई नहीं बता सकता . मार्ग दर्शक केवल दिशा दे सकता है , शेष सब तो स्वयं ही खोजना होता है .
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** जगत एक अद्भुत रहस्य **

मानव के लिए यह जगत एक अद्भुत रहस्य है . जिसको जानने की जिज्ञासा मानव मन में जगना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है . इस रहस्यपूर्ण जगत को जानने के लिए परम् आवश्यक है कि पहले इसके मूल को जाना जाय . क्योंकि मूल को जान लेने के पश्चात फिर कुछ भी जानने के लिए शेष नहीं बचता .
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** मूल-तत्त्व **

मूल तत्त्व , अर्थात जो जगत का मूल आधार है . जिससे समस्त जगत उदय होता है . और फिर अंततः उसी में विलीन हो जाता है . वही तत्त्व मूल-तत्त्व कहा गया है . ऐसे तत्त्व को जान लेने का अर्थ है कि आप ने सभी कुछ जान लिया . इसी लिए सभी जिज्ञासू ऋषि – मुनियों , संत – महात्माओं , ज्ञानी – विज्ञानियों , चिन्तक और विचारकों ने विभिन्न अद्भुत एवं गहन व अति गहन साधनाओं एवं सिद्धियों द्वारा उस तत्त्व को जानने में स्वयं को स्वाह किया .
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** परमात्मा और प्रकृति **

जगत में दो ही तत्त्व प्रमुख हैं . परमात्मा और प्रकृति . परमात्मा नित्य है और प्रकृति अनित्य . परमात्मा के नित्य होने से तात्पर्य है कि वह अभाव रहित होकर स्थिर एवम् अविनाशी है . उसका न तो कभी अंत होता है .और न ही उसमें कभी कोई विकार होता है . वह अमर अजर है. किन्तु प्रकृति अनित्य होकर अभावमय व अस्थिर है . इस कारण वह विकारी है. उसमें प्रति क्षण कोई न कोई परिवर्तन निरन्तर होता ही रहता है.
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** परमात्मा और प्रकृति का सामंजस्य **

परमात्मा जगत नियंता हैं . जगत की सृष्टि , पालन और प्रलय उन्हीं के संकल्प से संभव है . संकल्प उनका होता है . किन्तु यह साकार प्रकृति के माध्यम से ही होता है . परमात्मा अप्रत्यक्ष रूप से और प्रकृति प्रत्यक्ष रूप से अपना-अपना योगदान देते हैं . प्रलय के सुषुप्ति काल में प्रकृति परमात्मा में समाहित होकर रहती है . तब आपसी तादात्म्य सम्बन्धवश दोनों भिन्न होकर भी अभिन्न से प्रतीत होते हैं . जबकि यथार्थ में तो दोनों अपने-अपने प्रथक अस्तित्व में ही स्थापित होते हैं .
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